आखिर क्यों हम अक्सर बड़े लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते?

दोस्तो हम सफलता प्राप्तकरने के लिए हमेशा ही सीधा और छोटा रास्ता चाहते है लेकिन सफलता कभी एकमुश्त नहीं मिलती क्योंकि इसका रास्ता लम्बा और कठिन है। यह तो पड़ाव दर पड़ाव पार किया जाने वाला एक ऐसा सफर है जिसमे हमे दिन रात पूरी लगन से मेहनत करनी पडती है। अक्सर ऐसा होता है कि हम छोटे छोटे पड़ावों पर ही जीत के उत्सव में डूब जाते हैं, और अपने लक्ष्य को भूल जाते है। दोस्तो छोटी-छोटी कामयाबियों का जश्न मनाना तो जरूरी है लेकिन इसके उत्साह में असली लक्ष्य को ना भूला जाए। अक्सर लोग यहीं मात खा जाते हैं।

हमें अपना लक्ष्य तय करते समय ही यह भी तय कर लेना चाहिए कि हमारा मूल उद्देश्य क्या है और इसमें कितने पड़ाव आएंगे। अगर हम किसी छोटी सी सफलता या असफलता में उलझकर रह गए तो फिर बड़े लक्ष्य तक जाना कठिन हो जाएगा।

दोस्तो उदाहरण के लिए महाभारत का युद्ध, जो कौरवो तथा पांडवो के मध्यहुआ था, में चलते हैं। कौरव और पांडव दोनों सेनाओं के व्यवहार में अंतर देखिए। कौरवों के नायक यानी दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण जैसे योद्धा और पांडव सेना से डेढ़ गुनी सेना होने के बाद भी वे हार गए। धर्म-अधर्म तो एक बड़ा कारण दोनों सेनाओं के बीच था ही लेकिन उससे भी बड़ा कारण था दोनों के बीच लक्ष्य को लेकर अंतर। कौरव सिर्फ पांडवों को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से लड़ रहे थे।

जब भी पांडव सेना से कोई योद्धा मारा जाता, कौरव उत्सव का माहौल बना देते, जिसमें कई गलतियां उनसे होती थीं। अभिमन्यु को मारकर तो कौरवों के सारे योद्धाओं ने उसके शव के इर्दगिर्द ही उत्सव मनाना शुरू कर दिया।

वहीं पांडवों ने कौरव सेना के बड़े योद्धाओं को मारकर कभी उत्सव नहीं मनाया। वे उसे युद्ध जीत का सिर्फ एक पड़ाव मानते रहे। भीष्म, द्रौण, कर्ण, शाल्व, दु:शासन और शकुनी जैसे योद्धाओं को मारकर भी पांडवों के शिविर में कभी उत्सव नहीं मना।

उनका लक्ष्य युद्ध जीतना था, उन्होंने उसी पर अपना ध्यान टिकाए रखा। कभी भी क्षणिक सफलता के बहाव में खुद को बहने नहीं दिया।

तो दोस्तो हमे अपनी मंजिल के हर पडाव को जीत कर उत्साह तो जरूर मनाना चाहिए लेकिन अपना ध्यान लक्ष्य से क्भी नही हटाना चाहिए नही तो एक बार फिर असफल होना पडेगा।

धन्यवाद


जो डर गया समझो वो मर गया

दोस्तो आज मै आपके साथ एक ऐसा article share कर रहा हूँ, जो अपने आप मे बहुत ही महत्वपुर्ण है. जिंदगी मे यदि हम किसी चीज या काम को करने मे असफल होते है तो उसकी वजह केवल एक छोटा सा शब्द डर है. यह शब्द डर दिखने मे तो बहुत छोटा है लेकिन जिसके मन मे यह डर बैठ गया समझो वह इंसान मर गया.

दोस्तो डर एक ऐसी चीज है जो लगभग सभी के मन मे होता है. हर किसी मे अलग अलग प्रकार का डर होता है, जैसे किसी को परिक्षा मे फेल होने का डर तो किसी को नौकरी चली जाने का डर होता है. यह डर आम आदमी को अंदर से हिला कर रख देता है. एक असफलता के भय से एक साधारण आदमी हमेशा साधारण ही बना रहता है, क्योंकि वह डरता है कि कही वह असफल ना हो जाये. केवल डर कि वजह से आदमी कुछ नया नही कर पाता और ना ही अपनी क्षमताओ को पहचान पाता है. लेकिन जो इंसान एक बार इस डर के जंजाल से निकल जाता है, तो फिर पुरी दुनिया उसके कदमो तले होती है.

क्या आपने कभी सोचा है इंसान के मन मे डर आता क्यों है?

डर का एकमात्र कारण केवल आदमी के अंदर छिपी हुई अज्ञानता है. जब हम कुछ नया करना चाहते है और अगर हमे उस काम या चीज से सम्बंधित परिस्थितियो के बारे मे जानकारी नही है तो हम डॅरने लग जाते है कि कही कुछ गलत ना हो जाये. इस स्थिति मे हम उस काम को करने की बजाय उससे दूर भागने लग जाते है. जिससे उस काम के प्रति हमारा डर और भी भयानक हो जाता है. उस डर पर काबु पाने का सबसे आसान तरीका है कि जिस चीज या परिस्थिति से आप डर रहे है उसके बारे मे सही तथा अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर ले. जिस काम से आपको डर लगता है आप उसी काम को ज्यादा से ज्यादा करे तथा उस काम के साथ दोस्ती कर ले. फिर आपको लगेगा कि जिस काम या चीज से आप डर रहे थे वह तो एक दम साधारण है.

आपको जब भी किसी चीज या स्थिति से डर लगे, तो कम से कम एक बार खुद को आजमाकर देखे कि क्या मै इस डर पर जीत हासिल करके यह चीज प्राप्त कर सकता हूँ? इससे आपका कुछ भी नही बिगडेगा और केवल आत्मविश्वास ही बढेगा. अगर आपने इस डर के आगे घुटने टेक दिए, तब यह डर एक असलियत बन जायेगा और आप उस काम या चीज को अपने जीवन मे कभी भी प्राप्त नही कर सकोगे. जीवन मे कभी भी सफल नही हो सकोगे.

अगर जीवन मे हर कदम पर सफल होना है तो डर नाम की चीज को अपने अंदर से बाहर निकाल दो तथा केवल सकारात्मक सोच रखे नकारात्मक कभी ना सोचे.

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